संस्कतवर्णों की उत्पत्ति
विमर्श
डाँ.अभिनवउपाध्यायः
वर्ण विचार
वर्ण क्या है ?-वर्ण मूल ध्वनियों के उच्चारित रूप तथा उनके लिखित चिह्नमात्र हैं।एक प्रकार से भाषा की मूल ध्वनियों तथा उन ध्वनियों के प्रतीक स्वरूप लिखित चिन्हों को वर्ण कहते हैं ।संस्कृत में वर्णों का बोध कराने के लिए 14 सूत्र प्रसिद्ध हैं।इन 14 सूत्रों को माहेश्वरी सूत्र कहा जाता है।क्योंकि नृत्य के पश्चात् शिव जी ने अपने डमरू को 14 बार बजाया ,उससे जो 14 ध्वनियाँ निकलीं, वे14 सूत्र कहलायीं।
नृतावसाने नटराजराजो ननाद
ढक्कां नवपञ्चवारान् ।
उद्धर्तुकामः सनाकादि
सिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।
1.अइउण् 2.ऋलृक् 3.एओड्. 4.ऐऔच्. 5.हयवरट् 6.लण् 7.ञमङणनम् 8.झभञ् 9.घढधष् 10.जबगडदश् 11.खफछठथचटतव् 12.कपय् 13.शषसर् 14. हल् इन चौदह माहेश्वर सूत्रों से ४२ प्रत्याहर बनते हैं।
और प्रत्येक प्रत्याहर अन्त्य इत्संज्ञक वर्ण के साथ आदि वर्ण अपने तथा मध्यवर्ती वर्णों का भी बोधक होता है। ये 42 प्रत्याहार इस प्रकार से हैं ।
1.अक्- अ,इ,उ,ऋ,लृ ।(अकः सवर्णे दीर्घः)
2.अच्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ।
(इको यणचि)
3.अञ्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह,य,व,र,ल,ञ्,म,ङ,ण,न,झ,भ।
4.अट्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह्,य्,व्,र्। (शश्छो$टि)
5.अण्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह्,य्,व्,र्,ल्।
(अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः)
6.अम्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह्,य्,व्,र्,ल्,ञ्,म्,ङ्,ण्,न्।
(पुमः खय्यम्परे)।
7.अल्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह,य,व,र,ल,ञ,म,ङ,ण,न,झ,भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द,ख,फ,छ,ठ,थ,च,ट,त,क,प,श,ष,स,ह। (सभी वर्ण)
(अलो$न्त्यस्य)
8.अश्-अ,इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह,य,व,र,ल,ञ,म,ङ,ण,न,झ,भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द।
👉स्वर,ह,य,व,र,ल,वर्गों के3,4,5
(भोभगोअघोअपूर्वस्य यो$शि)। 9.इक्-इ,उ,ऋ,लृ।
【इको यणचि】
10.इच्-इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ।
【नादिचिः】
11.इण्-इ,उ,ऋ,लृ,ए,ओ,ऐ,औ,ह्,य्,व्,र्,ल। 【इण्कोः】
12.उक्- उ,ऋ,लृ। (उगतिश्च)
13.एड्.- ए , ओ।(एडःपदान्तादति)
14.एच्-ए,ओ,ऐ,औ।(एचो$यवायावः
15.ऐच्- ऐ,औ (वृद्धिरादैच)
16.खय्-वर्गों के 1,2 (पुनःखय्यम्परे)
17.खर् वर्गों के1,2,श्,ष,स्।(खरि च)
18.ङम्-ड्.,ण् न्।
(ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम्)
19.चय्- च्, ट,त्,क्,प्(वर्गों के प्रथम वर्ण) । . चयो द्वितीयाः…..(वा.)
20.चर्- वर्गों के प्रथमवर्ण, श्,ष्,स्,।
(अभ्यासे चर्च)
21.छव्- छ्,ठ्,थ्,च्,ट्,त्, (नश्छव्यप्रशान्)
22.जश्- ज्,ब्, ग्,ड्,द् (झलां जश् झशि)
23.झय्- वर्गों के 1,2,3,4(झयो हो$न्यतरस्याम्
24.झर्- वर्गों के1,2,3,4,श्,ष्,स्,ह्
(झरो झरि सवर्णे )
25.झल् - वर्गों के 1,2,3,4श्,ष्,स्,ह्
(झलां जश् जशि)
26.झश्- वर्गों के 3,4 (झलां जश् झशि)
27.झष्- वर्गों के चतुर्थ वर्ण (झ्,भ,घ्,ढ्,ध्)
(एकाचो बशो भष…..)
28.बश्- ब्,ग्,ड्,द्। (एकाचो बशो भष्)
29.भष्- झ के अलावा वर्गों के चतुर्थ वर्ण।
(एकाचो बशो भष्)
30.मय्- ञ् को छोडकर वर्गों के 1,2,3,4,5
(मयो उञो वो वा)
31.यञ्- य्,व्,र्,ल्,वर्गों के5, झ्,भ्।
(अतो दीर्घ़ यञि)
32.यण्- य्,व्,र्,ल्, (इको यणचि)
33.यम्- य्,व्,र्,ल्,ञ्,म्,ङ्,ण्,न्
(हलो यमां यमि लोपः)
34.यय्- य् व् र् ल् वर्गों के 1,2,3,4,5
(अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः)
35.यर्- य् ,व्,र्,ल्,वर्गों के1,2,3,4,5,श,ष,स,
(यरो$नुनासिके$नुनासिको वा)
36.रल्-य्,व् के अलावा सभी व्यञ्जन।
(रलो व्यचपधाद्धलादेः…..)
37.वल्-य् के अलावा सभी व्यञ्जन।
(लोपो व्योर्वलि)
38.वश्- व्,र्,ल्, वर्गों के 3,4,5
(नेड्वशि कृति)
39.शर्- श्,ष्,स्,
(वा शरि)
40.शल्- श्,ष्,स् ह्
(ऊष्म वर्ण)
41.हल्- सभी व्यञ्जन ।
(हलो$नन्तराः संयोगः)
42.हश्- ह्, य्, व्,र्,ल्, वर्गों के3,4,5।
( हशि च)।
43.ञम्- ञ्,म्,ङ्,ण्,न्।ञमन्ताड् डः(उणादि.
44.र - र्, ल्(उरण् रपरः)
- सामान्यतः अष्टाध्यायी में 41 प्रत्याहारों का
प्रयोग किया जाता है।”उरण् रपरः”सूत्र में
“र” को प्रत्याहार मानकर 42 प्रत्याहरों का
प्रयोग अष्टाध्यायी में किया गया है।लेकिन इन
प्रत्याहारों के अलावा उणादि सूत्रों में “ञम्”
प्रत्याहर तथा वार्तिकों में ‘चय-प्रत्याहार’ अलग से मानकर प्रत्याहारों की कुल संख्या
44 गिनी जा सकती है।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्
धन्यवादः
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